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सदा युवक रहने की कला एक छोटे बच्चे ने पिता से पुछा-“बाबा,ये वृक्ष के पत्ते हरे रंग के कितने अच्छे लगते है । माँ कहती है इसे परमात्मा ने रंग दिया है । क्या यह सच है ?” पिता ने कहा- “ बेटा,सच तो यह है कि इन पत्तों में क्लोरोफिल नाम का द्रव्य है और उसके कारण की पत्ते हरे होते है ।और कुछ नहीं ।“ कुछ दिनों बाद बच्चे की उस पत्तों के बारे में जिज्ञासा बंद हुई ।उसे तयार उत्तर मिल गया था । अब उसकी आँखों में कोई आश्चर्य नहींथा ।आश्चर्य मर ही गया था समझो । पिता उसे हर प्र्श्न के उत्तर विज्ञान और तर्क के आधार पर दिया करते थे जो विज्ञान की दृष्टी से ठीकभी थे । उन उत्तरों में एक गणीत था,तर्क था विज्ञान का आधार था । उन उत्तरों को कोई ठुकरा नहीं सकता था । लडका बडा हुआ ।अब उसने वही तर्क को सबकुछ समझ लिया। दुनिया में हर बात के लिये उसके पास अब एक व्याख्या थी । एक धारणा थी ।हर घटना के पिछे विज्ञान का प्रमाण था । बडा होते होते उस लडके ने समझा कि मैने अब सबकुछ जान लिया । मेरे पास सभी प्रश्नों के उत्तर है । हर चिज की व्याख्या है ।हर चिज मैने जान ली है । अब अज्ञात कुछ भीनही है । अपनी वैज्ञानिक दृष्टी पर वह गर्व का अनुभव करता था । उसकी शादी हुई ।धीरे धीरेवह बुढा हुआ । अब उसके पास हर प्रश्न के उत्तर ही उत्तर भरे पडे है ।अब कोई प्रश्न कासवाल ही नहीं है । अब तो वह उत्तरों को बाँटने के लिये तयार है । परंतु कोई प्रश्न करने वाला ही नही मिलता है ।जैसे की जगत में प्रश्न करनेवालों की सदा कमी होती है, उत्तर देनेवालों की नहीं । हर व्यक्ती के पास बडे प्रबुद्ध ज्ञानियों की बराबरी के उत्तरों जैसे तयार उत्तर है ।कमी किसी बात की नहीं है। अब वह अकेला रह गया । अब उसे आश्चर्यचकित करना बडा कठीन हो गया । अब उसे कोई चौका नहीं सकता था ।अब तो सबकुछ जाना हुआ है । किस बात के लिये चौकना? मैने सुना की एक व्यक्ती ने ठान ली की उस बुढे को चौका देना है । क्योकी उसने सोचा कि उस बुढे व्यक्ती का जीवन एक उदासी और शुष्कता से भरा दिखता है । वह अपनी बुद्धी पर बहुत विश्वास रखता है । उसपर गर्व महसुस करता है ।उस व्यक्ती ने बहुत विचार किया कि कैसे उस बुढे व्यक्ती को आश्चर्यचकित करु ।बहुत सोचने के बाद उसने उसबुढे व्यक्ती के स्नान गृह में अपना घोडा बाँधकर रखा और स्नानगृह का दरवाजा बंद किया । कुछ समय बाद उस बुढे व्यक्तीन स्नानगृह में प्रवेश किया । तुरंत वह लौटा । उसने उस व्यक्ती को कहा-“मैने कई बार स्नानगृह में घोडोंको बाँधा हुआ कई बार देखाहै । उसमे कुछ आश्चर्य नहीं है । “ बुढों को चौकाना कितना कठीन है ! घटना केवल उस बुढे व्यक्ती की ही है ? हर व्यक्ती ही उस बुढे जैसा हर बात के,हर घटना के उत्तर जीवनभर ढुँढता है । और अंत में अपनीआश्चर्य से भरी आँखे, जिज्ञासा और खोज से भरीदृष्टी खो देता है । एक बडे गुरु ने अपने शिष्य को ,उसने पुछे हुए प्रश्न के उत्तर में कहा की तेरा प्रश्न ही काफी है । उस प्रश्न को जीयो । प्रश्न ही प्यारा है । उत्तर की जल्दी मत करो । उत्तरों मे जीना भी क्या जीना है? वह तो मर जाने का दुसरा नाम है! तयार उत्तर की अपेक्षा मत कर । उसकी खोज करोऔर प्रतिक्षा करो । एक दिन अनुभव से जो आपको उत्तर मिलेगा उसके द्वारा मिला हुआ उत्तर आपको आनंद से आपुरीत कर देगा तयार उत्तर सदासे मौजुद है। शास्त्रों में पुराणों में भरेपडे है । बडों द्वारा पहले से दिये जा चुके है। उससे आपका विवेक नहीं जगेगा । उन्ही उत्तरों को शास्त्रीय भाषा में पांडित्य कहते है ।“ वैज्ञानिक दृष्टी बहुत अच्छी है । आज वैज्ञानिक दृष्टी को नजरअंदाज करके देश कुछ प्रगती नहीं कर सकता । परंतु व्यक्तीगत सोच के आधार पर सोचा जाए तो यदी व्यक्ती केवल बुद्धी के आधार पर जीए तो जीवन का आनंद नष्ट हो जाएगा । व्यक्ती के पास बुद्धी है और एक हृदय भी है जिसे आज का व्यक्ती भुल गया है । प्रमाण है व्यक्ती आज के युग में जी भरके रोने जैसी और जी भरके हँसने जैसी मौलिक बाते भुल गया है। और इसिलिये लाफिंग क्लब जैसी बातों का जन्म हो रहा है । आज के युग में बुद्धी का ही बोलबाला है ।जीवन में कला,संगीत,और प्रेम खो जाएगा । क्या जीवन एक रहस्य नहीं है ?इस रहस्य को जीना है सुलझाना नहीं है । यह रहस्य,इसके रहस्यपने का अनुभव करनेसे अपने आप सुलझता है । सरल सुलभ है जीवन पोथी, पर बडा जटील अनुवाद हुआ । उत्तर की खोज में रहनेवाला व्यक्ती बुढा हो जाता है । सर्वदा खोज से भरी दृष्टी,और जिज्ञासा व्यक्ती को आनंद से भर देती है । ऐसा व्यक्ती सर्वदा युवान ही रहता है । क्योंकि जीवन रोज नया है यह रहस्य जो जान जाता है वह रोज अपने आप को तरोताजा और सद्यस्नात अनुभव करता है । भगवान बुद्ध ने कहा है कि जीवन नया है और यहां कुछ भी पुराना या जाना हुआ नहीं है ।सभी रहस्य है । इसिलिये उन्होने पुराने उत्तरों का भी इंकार किया ।उत्तरों से भरे शास्त्र छोड दिये । दुसरी बात जिसमे हमेशा सिखने का भाव होता है वह युवक है । स्वामी रामतिर्थ की बातहै । एक बार वे जहाज पर कहीं जा रहे थे । उन्होने देखा एक बुढा व्यक्ती चिनी भाषा सिखरहा है । उन्होने उसे पुछा की साहब जी आप इस उमर मे चिनी भषा क्यो सिख रहे है ? एक तो यह भाषा कठीन है । इसमे वर्णमाला ही नही है । इसे सिखने में ही आपको कई वर्ष लगेंगे ? क्यो वक्त गँवा रहे हो? बुढेने रामतिर्थ को देखा और कहा कि शायद आप भारतीय हो ! क्योंकि भारतीय ही ऐसी मानसिकता रखते है । मै बुढा नही हूँ । शायद आप हो ! यह लक्षण ही बुढापे का है ।जिसने सिखना बंद किया वह अपनी जवानी खो देता है । स्बामीजी ने इससे सीख ली । समाज के कुछ व्यक्तीत्व ऐसे होते है जो कभी बुढे नहीं होते । रविंद्रनाथ टॅगोर,रमण महर्षी,रामतिर्थ,रामकृष्ण परमहंसये व्यक्ती अपने बुढापे में भी युवक ही रहे । जीवन के रहस्य को भाव से जीने की दृष्टी,सदा सिखने का भाव इससे ही के रहस्य कोजानकर व्यक्ती सदा युवान रह सकता है । आनंद का अनुभव कर सकता है । “रामकृष्णदास “